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नींद न आई रात भर – विवेक प्रकाश

सर्द रात, चूल्हे में आग जलाई रात भर
कमबख्त! पेट की आग बुझ न पाई रात भरl

किसी का हक़ मारा है फिर हुक्मरानों ने,
फ़िर इसी दर्द से नींद न आयी रात भर l

इक दिया जो रौशन करता था घर, दरों -दीवार को,
उसने जब बस्तियां सुलगायी रात भर l

सुन पत्थर पिघलने लगें!, तब मोम की खैर ही छोड़ो
कुछ उसने कुछ मैंने दास्तां ए ज़ख्म सुनाई रात भर l

मौत सा वो हाँथ छुड़ाती, मैं ज़िंदगी सा फ़िर कस लेता
यूंही मौत और ज़िंदगी ने आँख मिलाई रात भर l

था सितमगर फ़िर भी बिछड़ कर रो दिया,
सोंच रहा था वही मेंहदी, बिंदिया,चूड़ी, कलाई रात भर l

विवेक प्रकाश

(कानपुर)

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