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नजारा इस प्रकृति का – अजना गांवकर

 

कितना सुन्दर नजारा इस प्रकृति का

ये बहती हवायें, ये निर्मल झरना,

बारिश का गिरना, पंक्षियों का गाना

पेड पौधों से सजा, ये मनमोहक रचना ।

 

फूलों तितलीयों से रंगीन

ये दुनिया होती है प्यारी ,

मौसम के इस हर खेल में

प्रकृति होती हैं निराली ।

 

ऐसा  दृश्य होता तो था पहले कभी

और आज भी कहीं ,

पर खो गईं हैं आज ऐसी थी दुनिया

जो पहले थी कभी ।

 

मानव जाति ने अपने मतलब के लिए

जंगल कटा दियें गएँ ।

नयें उद्दोंगो के नाम पर

कारखाने बनवा दियें गएँ  ।

 

मिट्टी  को खोदकर

जमिन को बंजर बना दिया ,

कभी शुद्ध होता था पानी

आज उसे दूषित बना दिया ।

 

प्रकृति के कारण यह हवा

जेहेर जैसी हो गई है ।

प्रकृति हर तरह से

नष्ट होती दिखाई दे रही है ।

 

प्रकृति  ने इस मानव को

अपने गोद में ले लिया,

पर मानव ने इस प्रकृति के साथ

हर तरह का जुल्म किया ।

 

कचरा डालकर  इस मिट्टी में

जमिन को खराब किया ।

महामानव बनकर इस पर्यावरण /

प्रकृति का विनाश किया ।

 

अब हम सबको मिलकर

एक -एक कदम उठाना है ।

इस प्रकृति के विनाश को रोकना है ।

 

आओं मिलकर संकल्प ले

इस सृष्टि के विनाश को रोक ले ,

जिस प्रकृति माँ ने हमें गोद लिया है

चलों  उसे अपनी हथेली में थाँम लें ।

 

 

 

 

 

 

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