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मुरली – प्रतिभा दुबे

गीत मधुर सुनाए मुरली
बड़ी मधुर मुरली की तान
अधरो पर विराजे कृष्ण के
बनी प्रेम की यह पहचान ।।

जब जब मनोहर छेड़े तान,
नहीं रहता समय का भान
सुध – बुध सारी तन मन की
मुरली की धुन में खो जाती है।।

ना सोने की चाहत है मोहन
ना महलो की चाहत है मोहन
तेरी प्रेम की चाहत है राधे को
बस तेरी मुरली कि चाहत है ।।

ये काठ की हो करके
क्या कमाल दिखाती है
जो सोने की होती तो
क्या करती मेरे मोहन,
रोती हुई अखियों में
प्रभु मुस्कान ये लाती है
जादू है मुरली का ,
ये प्रेम सिखाती है।।

कहते है तेरी मुरली मोहन
हर दर्द मिटाती है
रूठो को मानती है ,
अपनों से मिलती है
तुझे प्रणाम है श्री मुरली
तू सच्चा मार्ग दिखाती है।।

प्रतिभा दुबे (स्वतंत्र लेखिका)
ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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