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मशहूर होने की कोई तरक़ीब न सीखा – अजय प्रसाद

गजलों को मेरी तू तहजीब न सीखा
मतला, मकता, काफ़िया, रदीफ न सीखा ।

कितनी बार गिराया है मात्रा बहर के वास्ते
कैसे लिखते हैं दीवान ये अदीब,न सीखा ।

देख ले शायरी में हाल क्या है शायरों का
किस तरह रह जाते हैं गरीब न सीखा ।

महफ़िलें, मुशायरें, रिसाले मुबारक हो तुझे
मशहूर होने की कोई तरक़ीब न सीखा ।

गुजर जाऊँगा गुमनाम, तेरा क्या जाता है
शायरी मेरी है कितनी बद्तमीज़ न सीखा ।

हक़ीक़त भी हक़दार है सुखनवरी में अब
ज़िक्रे हुस्नोईशक़, आशिको रकीब न सीखा ।

मेरी आज़ाद गज़लों पे तंज करने वालों
मुझे कैसे करनी खुद पे ,तन्कीद न सीखा ।

पढ़तें है लोग मगर देते अहमियत नहीं
अजय यहाँ है कितना बदनसीब न सीखा । 

अजय प्रसाद

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