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मैं अनाड़ी ही रहा, हर कोई क़ाबिल निकला – विवेक प्रकाश 

दिलों अज़ीज़ दोस्त दुश्मनों में शामिल निकला,
मेरी क़ब्र रोने वाला मेरा क़ातिल निकला l

मैं डूबना चाहता था इश्क़ के दरिया में,
नासमझ था, जहाँ डूबा वो शाहिल निकला l

बुज़ुर्गों की नसीहत जो दरकिनार किया मैने,
फस गया और उलझनों में, क्या हासिल निकला l

इस तेज़ दुनियां में, इस्तेमाल मेरा कुछ यूं हुआ,
मैं अनाड़ी का अनाड़ी ही रहा, हर कोई क़ाबिल निकला l

विवेक प्रकाश
(कानपुर)

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