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कहता हूँ गज़ल – अजय प्रसाद

जिम्मेदारियों के साथ , मै कहता हूँ गज़ल
हद से बाहर होती है बात मै कहता हूँ गज़ल ।

हसरतों,ख्वाहिंशो,जरूरतों से जाता खिलाफ़
कर वक़्त से दो-दो हाथ ,मै कहता हूँ गज़ल ।

दिन जिंदगी के जंजालों से,शाम चाहनेवालों से
उलझती है जब मुझसे रात ,मै कहता हूँ गज़ल ।

थकन,घुटन,चुभन,क्या-क्या सहता है ये बदन
फिर जब लड़ती है हयात , मै कहता हूँ गज़ल ।

उदास मन,बेचैन धुन,है जिन्दगी जैसे अपशगुन
ताने देते है जब मेरे हालात,मै कहता हूँ गज़ल ।

झुलस गई जिन्दादिली जद्दो-जहद की आग में
लगते है जलने जब जज्बात ,मै कहता हूँ गज़ल ।

अजय प्रसाद

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