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ज़हीन में ढल गया – अजय प्रसाद

शक़  मेरा   यकीन  में बदल गया
जाहिल  जब ज़हीन में ढल गया ।

आ ही गई जनता वश में आखिर
जादू  सियासत का जो चल गया।

कमाल है ये रुतवा-ए-शोहरत का
खोटा सिक्का भी आज चल गया।

कौन  सोंचता है  जाकर बुलंदी पे
किन राहों पे वो किसे कुचल गया ।

फायदा क्या है अजय पछताने का
मौका ही जब हाथ से निकल गया।

अजय प्रसाद

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